राजस्थान की कम्युनिस्ट राजनीति और किसान-मजदूर आंदोलनों के प्रमुख चेहरों में शामिल पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का सोमवार रात निधन हो गया। 94 वर्षीय बेनीवाल ने श्रीगंगानगर के टांटिया हॉस्पिटल में रात 10:58 बजे अंतिम सांस ली। बताया जा रहा है कि वे तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद उन्हें निमोनिया हो गया, जिससे उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। उनके निधन से श्रीगंगानगर सहित पूरे राजस्थान में शोक की लहर है। उनकी अंतिम यात्रा मंगलवार को उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी से निकाली जाएगी। उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का पिछले वर्ष निधन हो चुका है। परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री हैं। जनसंघर्षों से निकले जननायक 13 अक्टूबर 1932 को जन्मे हेतराम बेनीवाल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी विचारधारा से की। उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के टिकट पर 1967 में संगरिया विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव लड़ा। 1977 में पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन 1990-91 में वे संगरिया से विधायक चुने गए। हालांकि उनका कार्यकाल करीब ढाई वर्ष ही रहा, क्योंकि विधानसभा भंग कर दी गई। संगरिया क्षेत्र के पुनर्गठन के बाद 2004 में उन्होंने सादुलशहर से अंतिम बार चुनाव मैदान में उतरकर राजनीतिक पारी को विराम दिया। आंदोलनों के रणनीतिकार और गरीबों की आवाज हेतराम बेनीवाल को गरीबों और किसानों के मसीहा के रूप में जाना जाता था। उन्होंने राजस्थान कैनाल जमीन आवंटन आंदोलन, घड़साना किसान आंदोलन, जेसीटी मिल मजदूर आंदोलन तथा भाखड़ा और गंगनहर से जुड़े कई किसान आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी रणनीति और संगठन क्षमता इतनी मजबूत मानी जाती थी कि प्रशासन भी उनके कदमों को लेकर सतर्क रहता था। वे आंदोलनों को जनसमर्थन दिलाने में माहिर थे और अपनी सादगी तथा स्पष्टवादिता के कारण जनता के बीच विशेष पहचान रखते थे। बुलंद आवाज, बिना माइक के भी हजारों को बांध लेते थे कामरेड बेनीवाल की आवाज इतनी प्रभावशाली थी कि वे बिना माइक के भी हजारों की भीड़ को घंटों संबोधित कर लेते थे। प्रदर्शनों और सभाओं में वे तीखे व्यंग्य और चुटीले अंदाज से प्रशासन को ललकारते थे, जिससे माहौल में जोश भर जाता था। घड़साना पानी आंदोलन (2004-06) के दौरान वे किसानों को एकजुट रहने की शपथ दिलाते थे और अपने अनोखे अंदाज में नारे लगाकर आंदोलन को जनांदोलन का रूप देते थे। विधानसभा में भी उनका अंदाज अलग ही था। 1991-92 के दौरान एक बार जब सदन में शोरगुल हो रहा था, तो उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से कहा- पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूं। इस पर अध्यक्ष ने मुस्कराते हुए जवाब दिया- आप अपने स्वभाव से बोलिए, वे खुद चुप हो जाएंगे।
