किताब लेकर लौट रहे बच्चे से दरिंदगी:हैवानियत के बाद बोल नहीं पाया, बस रोता रहा; 18 साल बाद मिला इंसाफ - Mewar App

किताब लेकर लौट रहे बच्चे से दरिंदगी:हैवानियत के बाद बोल नहीं पाया, बस रोता रहा; 18 साल बाद मिला इंसाफ

18 साल… यह वक्त एक सजा की तरह था, जिसे अंकुर (बदला हुआ नाम) हर दिन झेलता रहा। उम्र बढ़ गई थी, चेहरे पर बालिगी की रेखाएं आ गई थीं, पर भीतर का वो 12 साल का बच्चा अब भी डर के कोने में दुबका था। साल 2007 की वो शाम उसके लिए किसी काली सुरंग जैसी थी, जिससे वह आज तक बाहर नहीं निकल पाया था। साल 2025 की एक सुबह, भीलवाड़ा की अदालत में जब पुराने केस की फाइल खुली तो लगा कि जैसे पुराना जख्म फिर हरा हो गया। कोर्ट में अब वो लड़का एक युवक बन चुका था और वो आरोपी, सफेद बालों वाला थका हुआ आदमी। लेकिन वक्त ने दोनों के भीतर की कहानी मिटाई नहीं थी। त्रिलोक सिंह… वही नाम, जो कभी बच्चों के बीच ‘भाईसा’ कहलाता था। उसी ने उस दिन मासूम अंकुर की दुनिया उजाड़ दी थी। अब वही अदालत की कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा था। सुनवाई का दिन था। अदालत खचाखच भरी थी। जज ने अंकुर को बुलाया। वो धीरे-धीरे उठा। गवाही के स्टैंड तक पहुंचा। उसकी आंखों में अतीत तैर रहा था। जज ने पूछा– ‘क्या तुम उस दिन की घटना याद करते हो?’ अंकुर ने सिर झुकाया, गहरी सांस ली और बोला- ‘हां, साहब, सब याद है। उस दिन मैं अपने दोस्त रवि (बदला हुआ नाम) के साथ किताब लेने गया था। रास्ते में त्रिलोक मिला। उसने मेरी साइकिल रवि को दी और मुझे अपनी साइकिल पर बैठा लिया। फिर वो मुझे सुनसान जगह ले गया… जहां अंधेरा था, और डर था।’ कोर्ट में सन्नाटा था। उसकी आवाज़ कभी कांप रही थी, कभी टूट रही थी, लेकिन हर शब्द अदालत की दीवारों से टकराकर लौट रहा था। उसने बताया- ‘त्रिलोक ने मेरे साथ गलत हरकत की। मैं चिल्लाया तो उसने मारा और कहा, अगर किसी को बताया तो जान से मार दूंगा। मैंने डरकर सब सह लिया। उस रात के बाद मैं बोल नहीं पाया, बस रोता रहा।’ 18 साल पुराने केस में बहुत कुछ खो गया था। कागज़ों की स्याही धुंधली थी, गवाह बूढ़े हो चुके थे, लेकिन सच अब भी ज़िंदा था। अभियोजन पक्ष ने डॉक्टर की रिपोर्ट और पुलिस की चार्जशीट कोर्ट में पेश की। मेडिकल अधिकारी ने बयान दिया- बच्चे के शरीर पर चोटें थीं, जो प्रतिरोध के समय लगी हों। जांच अधिकारी ने कोर्ट में कहा- त्रिलोक ने खुद घटनास्थल की निशानदेही करवाई थी। सबूत भले पुराने थे, पर कहानी वही थी। लोक अभियोजक रघुनंदन सिंह ने अपनी दलील में कहा- यह सिर्फ एक बच्चे के साथ अन्याय का मामला नहीं है, यह इंसाफ के इंतज़ार की लड़ाई है। अठारह साल तक इस युवक ने अपने भीतर उस रात का दर्द छिपाया। आज वह सच कहने की हिम्मत लेकर खड़ा है। अदालत को बताना होगा कि सच चाहे देर से आए, पर झूठ पर जीत उसकी ही होती है। दूसरी तरफ आरोपी त्रिलोक सिंह ने सिर झुकाए कहा- मैं बेगुनाह हूं। मुझे फंसाया गया है। अदालत के सामने पेश गवाहियों और मेडिकल रिपोर्ट ने उसके हर शब्द को झूठ साबित कर दिया। अंकुर की मां की गवाही भी उस दिन के डर और सच्चाई को और गहरा कर गई। उन्होंने कहा- उस रात जब वो घर लौटा, उसकी हालत देखकर मैं कांप गई थी। वो बोल नहीं पा रहा था। बस कह रहा था- मां, मैं डर गया हूं। 20 अक्टूबर 2025 को दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने आरोपी को पांच वर्ष के सश्रम कारावास और नौ हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। बेटे को देखते ही मां की चीख निकल पड़ी:रातभर जागती रही, सुबह पति को किया कॉल; आखिर मासूम के साथ हुआ क्या?